एक पारिजात, दो यात्राएँ by Neha Garg
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कुछ साल पहले घर पर माली भैया जब नए पौधे लेकर आए तो उनमें से एक पौधा पारिजात का था। उन दिनों मैंने नया-नया पढ़ाना और गणित को एक नए नज़रिए से देखना शुरू किया था, खासकर प्रकृति और गणित के तालमेल को । और जब यह पौधा बढ़ने लगा, तब इसकी पत्तियों की सजावट ने मुझे काफी आकर्षित किया। पत्तियाँ हमेशा दो के जोड़े में एक दूसरे के विपरीत रहतीं और अगला जोड़ा हमेशा 90° पर घूम कर लगता। ऐसा करने से शायद हर पत्ती के ऊपर सूरज की रोशनी बखूबी पड़ती थी।

देखते ही देखते इस पौधे में मुझे दिलचस्पी हो गयी और आय दिन सुबह उठकर मैं सबसे पहले यह पौधा देखने, पत्तियों की सजावट देखने, उनकी लंबाई देखने ऊपर जाती। माली भैया से पूछने पर पता चला कि लगभग एक साल में पारिजात के फूल पौधे पर लगने लगेंगे। बारिशों के बाद हर दिन मैं इस उम्मीद में छत पर जाती कि पौधे पर फूल खिले होंगे। दो साल तक लगभग यही सिलसिला रहा, लेकिन फूलों ने दस्तक ना दी और धीरे-धीरे मैं भी उम्मीद खोने लगी।
एक दिन शाम को जब अंधेरा छाने लगा तब टहलने के लिए मैं छत पर गई। टहलते वक्त अचानक से मेरी नजर पारिजात के पत्ते पर पड़ी एक सफेद सी वस्तु पर पड़ी। पास जाकर देखा तो एक कोमल सा फूल पौधे को हल्के से जकड़ा था जो मेरे छूने पर मेरे हाथ में आ गया। एक मीठी खुशबू से भरपूर पारिजात का फूल। जिसके आने की उम्मीद मैं छोड़ चुकी थी, वो उस दिन दो साल बाद सहजता से इस पौधे पर खिला हुआ था। आज भी वो लम्हा मेरी आंखों में मानो वैसे का वैसा कैद है।
लेकिन मुझे मालूम नहीं था 6 साल पहले इस कैद लम्हे को मैं आने वाले समय में धागों में भी पिरोउँगी। जिस लैब में मैं काम करती हूं, वहाँ एक प्रोजेक्ट के लिए मैं एम्ब्रायडरी और उसके पीछे की गणित समझने की कोशिश कुछ महीनों से कर रही थी। थोड़ी बहुत गणित तो समझ आई, लेकिन हाथ से इतनी एम्ब्रायडरी नहीं कर पाई।
इसी दौरान दो महीने पहले IIT में प्रियम ने एक छोटा सा कोर्स किया - Poems and Pixels, और क्योंकि वो भी एम्ब्रायडरी पर था तो मैंने उसमें भाग लिया। इस कोर्स में प्रियम हमें कसूती एम्ब्रायडरी सिखाने वाली थीं। कसूती की खास बात यह है कि आप जिस जगह से अपने डिज़ाइन को शुरू करते हैं, उसी जगह पर आकर उसे खत्म करना होता है। कपड़े के आगे और पीछे समान डिज़ाइन बनती है और एक बार धागा चल जाने के बाद उसके ऊपर दोबारा धागा नहीं चला सकते।

पहले ही दिन एम्ब्रायडरी करने से जो सुकून मिला वो शायद ही मैं शब्दों में बयान कर सकूं। जब हम सब पैटर्न बनाने में सहज हुए, तब प्रियम ने सभी को अपना खुद का पैटर्न बनाने को कहा। आमतौर पर जब भी कुछ व्यक्तिगत करने को कहा जाता है तो आपका ध्यान उस चीज पर जाता है जिससे या तो कोई याद जुड़ी हो या कोई चीज़ जो आपके दिल के बहुत करीब हो। मैं भी यही सोचने लगी की कौन सा फूल है जो मुझे बेहद पसंद है - गुलमोहर, बोगनवेलिया, गुलाब या पारिजात, और जैसे ही पारिजात दिमाग में आया, तय हुआ यही बनाएंगे। अब करना क्या था - पारिजात के फूल को कसूती के लिए कैसे बनाएं यह सोचना था। आमतौर पर पारिजात की पांच या छः पंखुड़ियां होती हैं और यह घड़ी की दिशा में लगभग बराबर कोन पर सजी होती हैं। जिस चौखानेदार कपड़े पर मैं काम कर रही थी, उस पर छः पंखुड़ियों वाला फूल वाला नामुंकिन लगा और कुछ देर सोचने के बाद चार पंखुड़ियों वाला पारिजात संभव लगा। काफी कोशिश करने के बाद अंत में यह बेल बनकर तैयार हुई, जिसे मैंने इस काले कपड़े पर उतार कर एक बुकमार्क में संजो दिया।

Bio: Neha is part of the Maths team in CCL. She is responsible for curriculum design, development of new content and conducting workshops.
2 comments
ये मेरा भी मनपसंद फूल है। मैं इसे हरसिंगार के नाम से जानती हूँ। पर इसके फूलों की ख़ुशबू, जो बड़ी भीनी है, के कारण मुझे इसे सौम्या के नाम से बुलाने का मन करता है। इसके पत्ते आयुर्वेद में औषधि की भांति प्रयोग में लाए जाते हैं। मैं ने ये भी सुना है कि इस वृक्ष के पास सांप नहीं आते।
बहुत बढ़िया!!!!!😍
आप की सोच को सलाम। क्योंकि हम लोग भी हररोज बहोत सारे फूल देखते पर कभी ऐसे एम्ब्रायडरी के बारे मे सोचा नहीं ।।।हमेशा के लिए संभल कर रख सकते है 🧿☺️